Who Am I (HINDI )
मैं कौन हूँ? एक जल की बूँद तालाब में प्रवेश करती है और यं को तालाब मान लेती है।
वह नदी में जाती है और यं को नदी समझती है। वह बोतल में जाती है और यं को
बोतल समझती है। वह िगलास में जाती है और यं को िगलास मान लेती है। िकु जब
सभी पात्र हटा िदए जाते हैं, तब ा शेष रहता है? के वल जल। ा हमारे साथ भी ऐसा
ही नही ं है? जब हमारा नाम, वसाय, धमर्, िलंग, उपलयाँ, असफलताएँ , संबंध, संपि
और सामािजक पहचानें हट जाएँ, तो वाव में ा शेष रहता है? हम उन सभी पहचानों
के नीचे वाव में कौन हैं? इस गहन, िचंतनशील और आाक रूप से परवतर्नकारी
पुक में डॉ. अिभषेक िगलारा पाठकों को श्रीमद्भगवद्गीता, रामचरतमानस, उपिनषदों
तथा संतों की कालजयी िशक्षाओं के माम से मानव जीवन के सबसे महपूणर् प्र—“मैं
कौन हूँ?”—
की गहन यात्रा पर ले जाते हैं। बूँद और समुद्र, लहर और जल, तथा प्रेक उपकरण के पीछे कायर्रत एक ही िवद्युत जैसे सरल िकु
प्रभावशाली उदाहरणों के माम से यह पुक उद्घािटत करती है िक हम यं को शरीर ों समझ बैठते हैं; माया अलगाव का भ्रम
कै से उ करती है; जीवाा और ब्रह्म के बीच वािवक संबंध ा है; हमारी िद प्रकृ ित होने के बाद भी दुःख ों अ में है;
आ-साक्षाार में गुरु की भूिमका ा है; किलयुग में नाम-जप की श और उसका मह; संसार में रहकर भी उससे बंधे िबना
कै से िजया जाए; मृु अंत ो ं नही ं है; आाक जागरण के प्रमुख संके त ा हैं; और प्रेक मनु के भीतर िछपा हुआ परम स
ा है। यह के वल आाकता पर िलखी गई एक पुक नही ं है। यह पहचान पर िलखी गई पुक है। यह रण पर िलखी गई
पुक है। यह अपने वािवक घर लौटने की यात्रा पर िलखी गई पुक है। ोिं क जीवन की सबसे बड़ी खोज कोई नई वु प्रा
करना नही ं है। जीवन की सबसे बड़ी खोज है—उस स को पुनः रण करना, जो आप सदैव से थे। बँूद कभी समुद्र से अलग थी ही
नही।ं आा कभी परमाा से अलग थी ही नही।ं
































