REWRITING A 100-YEAR LEGACY part-1(hindi)
सिदयों पुरानी एक कला आधुिनक रूप कै से प्रा करती है? 85
वषर् पुराना एक ापारक प्रितान िडज़ाइन-आधारत िविनमार्ण
श में कै से िवकिसत होता है? एक पारंपरक ब्राइडल श्रेणी
रा ीय र की पहचान कै से बन जाती है? इस अंत गत
और रणनीितक िववरण में, डॉ. अिभषेक िगलारा बताते हैं िक िकस
प्रकार अनुशािसत नवाचार ने कुं दन मीना पोी जड़ाऊ आभूषण
उद्योग को नई िदशा दी। टूटे हुए आभूषणों के पुनः
उपयोग से लेकर िमिश्रत िडज़ाइनों के िनमार्ण तक, युवा कारीगरों को प्रिशिक्षत करने से लेकर
सुवत िविनमार्ण प्रणािलयाँ िवकिसत करने तक, मू-आधारत प्रितधार् ािपत करने से
लेकर सुिवधा के दायरे से बाहर िनकलकर साहिसक परवतर्न अपनाने तक—यह पुक दशार्ती
है िक िकस प्रकार रचनाकता, अनुशासन, दूरदश सोच और पीढ़ीगत िवरासत ने िमलकर भारत
के ब्राइडल ेलरी उद्योग में एक शांत िकं तु ऐितहािसक क्रांित का सूत्रपात िकया। यह के वल
ावसाियक िवकास की कहानी नही,ं ब श्रेणी िनमार्ण, िवरासत-आधारत नेतृ, रचनाकता
के सुवत प्रबंधन, नैितक एवं सतत िवार तथा ऐसी प्रिता के िनमार्ण पर एक ावहारक
मागर्दिशर्का है जो बदलते रुझानों से भी अिधक समय तक जीिवत रहती है। यह पुक उद्यिमयों,
पारवारक वसाय के नेताओं, िडज़ाइनरों और उन सभी लोगों के िलए है जो के वल सफलता
नही,ं ब आने वाली पीिढ़यो ं के िलए एक ायी िवरासत का िनमार्ण करना चाहते हैं।
































