REWRITING A 100-YEAR LEGACY_ WHEN TRADITION WENT PUBLIC — PART 8 hindi
100 वष की िवरासत को पुनः िलखना: जब परंपरा सावर्जिनक हुई — राजोज़ द्वारा 1921
से — एक शताी पुरानी िवरासत, जेन ज़ी के िलए नए रूप में प्रुत — भाग VIII एक
सिदयों पुरानी आभूषण परंपरा सबसे युवा पीढ़ी की सबसे पसंदीदा िवकों में से एक कै से बन
जाती है? दो दशक से कु छ अिधक समय पहले, कुं दन, मीना, पोलकी और जड़ाऊ आभूषणों
का वसाय एक कही ं अिधक सीिमत पारंपरक बाज़ार के भीतर संचािलत होता था, िजसे
तुलनाक रूप से सीिमत िडज़ाइन िविवधता और कारीगरों के तंत्र का समथर्न प्रा था। िफर
एक प्र सामने आया: िवरासत के वल उी ंलोगो ं तक सीिमत ो ं रहे िजोनं े इस परंपरा को
उरािधकार में प्रा िकया है? हम अगली पीढ़ी को अपनी पसंद से इस परंपरा से प्रेम करने
के िलए प्रेरत ो ं नही ंकर सकते?
इस अंत गत वृांत में, डॉ. अिभषेक िगलारा वषर् 1921 में शुरू हुई एक आभूषण िवरासत की चौथी पीढ़ी की यात्रा पर िचंतन
करते हैं—िडज़ाइनों का िवार करना, कारीगरों की क्षमताओं का िवकास करना, आधुिनक दुन को समझना, इस िश को पूरे भारत
में पहुँचाना, संगठन को पेशेवर रूप देना और अंततः इस परंपरा को भारत के सावर्जिनक पूँजी बाज़ारों तक ले जाना। लेिकन यह के वल
आभूषणो ं की कहानी नही ं है। यह एक ऐसी पुक है जो बताती है िक परवतर्न के बीच िवरासत कै से जीिवत रहती है। रचनाकता िकस
प्रकार परंपरा को लोगों की चाहत में बदल सकती है। ग्राहक िकस प्रकार के वल िकसी िश को पाने की इा रखकर उसका संरक्षण कर
सकते हैं। वस्थाएँ िकस प्रकार एक परवार के िवास को बड़े र तक पहुँचा सकती हैं। पूँजी िकस प्रकार िजेदारी से उपयोग िकए
जाने पर संृ ित को सश बना सकती है। सावर्जिनक ािम िकस प्रकार िजेदारी को बदल देता है। और अगली पीढ़ी को के वल शेयर
ही नही,ं ब प्रासंिगकता भी उरािधकार में ो ं िमलनी चािहए। जौहरी बाज़ार से दलाल ीट तक, और अब दुिनया की ओर बढ़ती हुई,
यह 106 वष पुरानी एक ऐसी िवरासत की कहानी है जो अपने ही अतीत का संग्रहालय बनने से इनकार करती है। ोिं क परंपरा के प्रित
सबसे बड़ी श्रद्धांजिल िपछली पीिढ़यो ं द्वारा बनाई गई चीज़ो ं को बार-बार दोहराते रहना नही ं है। ब उनकी आा को समझना और वह
सृजन करना है जो वे यं करते, यिद वे आपके समय में जीिवत होते। परंपरा ने हमें जड़ें दी।ं रचनाकता ने हमें प्रासंिगकता दी। िवास
ने हमें िवार िदया। सुशासन ने हमें सावर्जिनक बाज़ार तक पहुँचाया। अगली पीढ़ी को इस िवरासत को आगे ले जाना होगा। अतीत पहले
ही िलखा जा चुका है। हमारी िजेदारी यह सुिनित करना है िक भिव उस िवरासत के यो बने।
































