REWRITING A 100-YEAR LEGACY part- 6 (HINDI)
100 वष की िवरासत का पुनलखन — जब परंपरा सावर्जिनक हुई — कै से हमने
सिदयो ं पुरानी कला को सबसे तेजी से बदलते फै शन युग में फलने-फू लने यो
बनाया। ा चीज िकसी पारवारक वसाय को एक शताी से अिधक समय तक
जीिवत रहने की श देती है, जबिक अनिगनत अ वसाय समा हो जाते हैं?
कृित्रम बुद्धमा, िडिजटल परवतर्न और तेजी से बदलते उपभोा वहार के युग
में प्राचीन िशकला प्रासंिगक कै से बनी रह सकती है? ा परंपरा और नवाचार
वाव में साथ-साथ रह सकते हैं?
100 वष की िवरासत का पुनलखन में डॉ. अिभषेक िगलारा उन कालातीत िसद्धांतो ं को साझा करते हैं, िजोनं े 1921 में
जौहरी बाजार की ऐितहािसक गिलयो ं में स्थािपत एक िवरासत आभूषण प्रितान को भिव के िलए तैयार एक आधुिनक
संस्थान में परवितर्त िकया। यह के वल एक ावसाियक पुक नही ं है, ब संरक्षकता, नेतृ, पारवारक मूो,ं
िशकला, ब्रांड िनमार्ण, तकनीक, शासन वस्था और हर पीढ़ी की उस िजेदारी पर अंत गत िचंतन है, िजसके
अंतगर्त उसे भिव को उस अतीत से अिधक मजबूत बनाकर छोड़ना चािहए, जो उसे िवरासत में िमला था। प्रभावशाली
कहािनयो ंऔर ावहारक ज्ञान के माम से यह पुक बताती है िक िवरासत एक जीवंत िजेदारी है, संग्रहालय में रखी
कोई वु नही;ं ब्रांड िवज्ञापन से नही,ं िवास से बनते हैं; तकनीक को मानवीय संबंधो ं को मजबूत करना चािहए, उनका
स्थान कभी नही ंलेना चािहए; महान संस्थान संपि देने से पहले मू आगे सौपं ते हैं; और स्थायी सफलता अपनी जड़ो ंकी
रक्षा करते हुए वतर्मान को अपनाने से िमलती है। चाहे आप एक उद्यमी हो,ं पारवारक वसाय के ामी हो,ं पेशेवर हो ं
या िकसी संगठन के भिव को आकार देने वाले नेता हो,ं यह पुक एक कालातीत स की याद िदलाती है—सबसे महान
िवरासत वह नही ं है, जो हमें िमलती है। वह है, िजसे हम अपने पीछे छोड़ने का चुनाव करते हैं। “अपनी जड़ो ं को कभी मत
छोिड़ए। वतर्मान में जीना कभी मत छोिड़ए। इसी तरह िवरासतें सिदयो ं तक जीिवत रहती हैं।”
































