REWRITING A 100-YEAR LEGACY part- 4 (HINDI)
100 वषर् पुरानी िवरासत का पुनलखन – भाग IVजब परंपरा सावर्जिनक हुई कंु दन, मीना,
पोी और जड़ाऊ कला के िव के प्रथम आईपीओ की कहानी106 वषर् पुरानी एक
पारवारक िवरासत सावर्जिनक पँूजी बाज़ार तक कै से पहुँचती है?जयपुर के ऐितहािसक जौहरी
बाज़ार के दो छोटे कमरो ं से संचािलत होने वाला एक पारवारक वसाय एक सावर्जिनक
रूप से सूचीबद्ध संा में कै से परवितर्त होता है?और सिदयो ं पुरानी भारतीय कारीगरी अपनी
आा को सुरिक्षत रखते हुए कॉपरेट गवनस को कै से अपनाती है?“100 वषर् पुरानी िवरासत
का पुनलखन” त्रयी के इस अंत प्रेरणादायक और आीय अंितम भाग में, डॉ. अिभषेक
िगलारा भारतीय िवरासत आभूषण उद्योग की सबसे ऐितहािसक उपलयो ं में से एक की
वािवक कहानी साझा करते हैं।वषर् 2008 में आधुिनक शोरूम में ानांतरण से लेकर…वषर्
2019 में एडिवट े िलिमटेड की ापना तक…िवरीय िविनमार्ण वा और
कॉपरेट गवनस के िनमार्ण से लेकर…भारत भर में आयोिजत िनवेशक रोड शो और 1 जुलाई
2026 को बॉे ॉक एचेंज में घंटी बजने के ऐितहािसक क्षण तक…यह पुक उस संपूणर्
यात्रा का दावेज़ है, िजसमें एक शताी पुरानी परंपरा ने सावर्जिनक पँूजी बाज़ार में अपना
ान बनाया।यह के वल एक आईपीओ की कहानी नही ं है।
यह कहानी है—• िवरासत और नेतृ की।• पारवारक वसाय के परवतर्न की।• कॉपरेट गवनस और संा िनमार्ण की।• कुं दन,
मीना, पोी एवं जड़ाऊ कला के संरक्षण की।• बहु-पीढ़ीगत उरािधकार और संरक्षक की।• दूरदृि, धैयर् और दीघर्कािलक सोच
की।अपने गत अनुभवों, वािवक जीवन की घटनाओं और वष की सीख के माम से डॉ. अिभषेक िगलारा यह िसद्ध करते हैं
िक िवरासत और आधुिनकता एक-दू सरे की िवरोधी नही ंहैं।सही मूो ं के मागर्दशर्न में वे एक-दूसरे की सबसे बड़ी सहयोगी बन
जाती हैं।कु छ कं पिनयाँ पँूजी जुटाने के िलए सावर्जिनक होती हैं।लेिकन यह संा सिदयो ं पुरानी भारतीय कला को सुरिक्षत
रखने के उद्दे से सावर्जिनक हुई।जौहरी बाज़ार से दलाल ीट तक।परंपरा से संा तक।िवरासत से इितहास तक।
































