REWRITING A 100-YEAR LEGACY part-3(hindi)
ा होता है जब 106 वषर् पुरानी एक पारवारक िवरासत सावर्जिनक पूँजी
बाज़ार में प्रवेश करती है?ा होता है जब सिदयों पुराना िश-कौशल
आधुिनक कॉरपोरेट गवनस से िमलता है?ा होता है जब परंपरा अपनी
आा को सुरिक्षत रखते हुए िवार का मागर् चुनती है?यह उस अद् भुत यात्रा
की कहानी है िजसमें भारत की कुं दन, मीना, पोी और जड़ाऊ कला में
गहराई से रची-बसी एक िवरासत ने यं को भिव के िलए तैयार संा में
रूपांतरत िकया और इस कला-श्रेणी का िव का प्रथम आईपीओ लाकर
इितहास रच िदया।यह के वल वसाय की कहानी नही ं है।यह उरदािय,
दूरदृि, िवास और संरक्षण की कहानी है।
।अपने गत अनुभवों और जीवन की वािवक घटनाओं के माम से डॉ. अिभषेक िगलारा बताते हैं िक
िकस प्रकार पीिढ़यों पहले प्रार हुआ एक िमशन भारतीय िश-कला के संरक्षण से आगे बढ़कर एक वैिक
आंदोलन में परवितर्त हुआ—एक ऐसा आंदोलन जो कला के संरक्षण, कारीगरों के सशकरण, संृित की
मजबूती और सिदयो ं तक जीिवत रहने वाली संाओ ं के िनमार्ण के िलए समिपर्त है।अपने पूवर्जो ं की आाक
िशक्षाओं से लेकर बॉे ॉक एचेंज में घंटी बजाने के ऐितहािसक क्षण तक, यह पुक उस परवार की यात्रा
को प्रुत करती है िजसने िवास िकया िक वसाय सेवा का माम होना चािहए और िवकास संरक्षण का साधन
बनना चािहए।िवरासत, नेतृ, उद्यिमता, आाकता और रा -िनमार्ण का यह प्रेरक संगम उन सभी लोगों के
िलए एक मागर्दिशर्का है जो मानते हैं िक परंपरा और नवाचार साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं।ोिं क कु छ आईपीओ
के वल पूँजी जुटाते हैं।यह आईपीओ एक संपूणर् कला-परंपरा के भिव को सश बनाने के िलए अ
में आया।
































