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Rewriting a 100-Year Legacy part-02 (HINDI)

Rewriting a 100-Year Legacy part-02 (HINDI)

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सिदयों तक कुं दन, मीना, पो􀊋ी और जड़ाऊ आभूषणों की अद्भुत कला एक
अ􀈑ंत संरिक्षत िवरासत रही, िजसे राज􀋕ान के कु शल िश􀊙कारों ने अपने अिद्वतीय
कौशल से सृिजत िकया और िजसे मु􀆥तः कु छ राजघरानों तथा मारवाड़ी प􀄯रवारों
द्वारा संजोया गया। आज यह असाधारण िश􀊙 एक नए युग में प्रवेश कर रहा है।
Rewriting a 100-Year Legacy – Exploring the Scope of Kundan Meena
Polki Jadau Ornaments (Part 2) में डॉ. अिभषेक िगलारा पाठकों को भारत की
सबसे प्रिति􀊿त आभूषण परंपराओं में से एक के अतीत, वतर्मान और भिव􀋈 की
प्रेरणादायक यात्रा पर ले जाते हैं। रांभाजोज़ (Rambhajoʼs) की 100 वष􀅘 से अिधक
पुरानी पा􀄯रवा􀄯रक िवरासत और अनुभवों के आधार पर यह पु􀋑क बताती है
िक िकस प्रकार यह िवरासत-आधा􀄯रत िश􀊙 एक सीिमत सामुदाियक परंपरा से िवकिसत होकर रा􀊼􀅌 ीय 􀋑र पर भारतीय
दु􀊥नों की आकांक्षा का प्रतीक बना तथा भिव􀋈 में ₹1 लाख करोड़ के उद्योग के रूप में िवकिसत होकर वैि􀊷क मंच पर
भारत की िविश􀊼 लक्ज़री 􀇜ेलरी कला के रूप में 􀋕ािपत हो सकता है। गहन बाज़ार िव􀊶ेषण, सां􀋋ृ ितक दृि􀊼कोण और
􀊩􀄰􀆅गत अनुभवों के मा􀈯म से लेखक भारत के िवशाल िववाह आभूषण बाज़ार, लक्ज़री ब्राइडल 􀇜ेलरी में कुं दन पो􀊋ी
की अपार संभावनाओं, जयपुर और बीकानेर के िश􀊙कार समुदायों द्वारा सिदयों पुरानी कारीगरी के संरक्षण, भिव􀋈 में
िवरासत-आधा􀄯रत चुिनंदा ब्रांडों की नेतृ􀈕कारी भूिमका तथा भारतीय िवरासत आभूषणों के िव􀊷 की सबसे प्रिति􀊿त लक्ज़री
िश􀊙 परंपराओं के समकक्ष 􀋕ािपत होने की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हैं। यह पु􀋑क के वल एक 􀊩ावसाियक यात्रा
का वणर्न नही ं है, ब􀄰􀊋 उन िश􀊙कारो,ं परंपराओ ं और दू रदश􀅎 सोच को समिपर्त एक श्रद्धांजिल है, जो भारतीय आभूषण
उद्योग के भिव􀋈 को िनरंतर आकार दे रहे हैं। यह प्रामािणकता की रक्षा करते हुए िवकास को अपनाने का संदेश देती है
और पाठकों को ऐसे भिव􀋈 की क􀊙ना करने के िलए प्रे􀄯रत करती है, जहाँ संपूणर् िव􀊷 कुं दन, मीना, पो􀊋ी और जड़ाऊ
आभूषणों को भारत की कालातीत लक्ज़री कला के रूप में स􀊃ानपूवर्क 􀋢ीकार करे। डॉ. अिभषेक िगलारा — उद्यमी,
लेखक एवं शता􀉨ी-प्राचीन िवरासत के संरक्षक।

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